लोकतंत्र में सवालों के गोल-मोल जबाव

             
       विश्व का सबसे बड़े लोकतंत्र का दावा करते है हम और हमारी सरकारे, पर जब बात वाजिब सवालों का आता है तो क्या हम वो सब हक पाते है जो वास्तव में एक लोकतांत्रिक शासन या देश के लोगो को वाकई मिलना चाहिए । यह एक सोचने वाली बात है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में देश के हक में क्या हो रहा है उसमें जनता को ही बाहर का रास्ता दिखला दिया जा रहा है उसे बस आर्डर के माध्यम से पता चल जाता है कि सरकार यानी की जो बस कुछ लोगो में रह कर जीवन जी रही है उसने आपके लिए कुछ नियम या सौदा कर लिया है आपको कल से उसे मानना है आप चाह कर या तो चुप रहे या चिल्ला ही ले कौन आपकी बात  को सुनने को तैयार है आज के दौर में हर प्रशासन का दुरप्रयोग होने से सरकार नही हिचकती है
        हालात यह है कि आम जनता की आवाज तो सुनने का प्रश्न  ही नही बनता और जो कुछ लोग सरकार से आँख में आँखे डालकर सवाल कर ऱहे है उनपर इतनी पाबन्दी लगा दी जा रही है या तो वे चुप हो जाए या कानून के द्वारा या तो जान के डर से अपना मुँह बन्द करने पर मजबूर है
       आज दौर में जब रहकर एक एक चीज को देश के विकास के नाम पर निलाम किया जा रहा है तो आपको बताने की जरूरत सरकार नही समझ रही है ऐसा क्यों है कि अहम संस्थाएं जो देश का गौरव हुआ करती थी लगातार देश उनपर गर्व करता था और है भी उनमें ऐसी क्या कमी आ गई कि सब की सब देश के लिए घाटे का सौदा हो गई और उनमें क्या मंतर मार दिया जाएगा कि नीजीकरण होते ही वे सब देश के हित मे और विकास की भागीदार हो जाएगी अगर कुछ हो सकता ही है तो सरकार को कुछ ऐसा करना चाहिए
         अगर सरकारी संस्थाएं कमजोर है या उनमें कही कमी है जो सरकार वो कदम उठाए जो दूसरे नीजी संस्थाए उठाएंगी देश में रहरहकर एक जो जरूरी मुद्दे होते है उनपर बाते न तो सरकार करनी चाहती है न तो देश के मिडिया चैनल जिनकी पहुच घर-घर तक है। तो आपको बस लालीपॉप दे देते है आप उनमें व्यस्त रहे और धीरे धीरे हर चीज नीजी लोगों के हाथ में पहुच जाएगी
          अभी हाल में रेलवे के नीजी करण के विरोध में बिहार मे छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया है कितने न्यूज चैनलो ने उसे कवर किया या आए दिन किसी न किसी शहर में विरोध प्रदर्शन होते रहते है युवा लोग पुलिस की लाठी और आँसू गैस की प्रताडना सहकर वापस आ जाते है फिर न्यूज चैनल यह न दिखाकर आपको यह बता देते है कि किसी मंत्री ने कोई मजाकिया बयान दे दिया है उसपर डिबेट होगी जबकि मंत्री यह जान बूझ कर करते है उनकी सोची समझी चाल होती है ये सब कि देश जरूरी मुद्दे रोजी रोटी पानी बिजली और रोजगार पर्यावरण पर बात छोड़कर नेता के बयानों पर बात होगी जैसे ही यह कुछ ठंडा होगा तब तक पाकिस्तान से कुछ मसाला आ जाएगा आम जनता और उनके मुद्दे जाए भाड़ में उससे नेता जी को क्या मतलब है वो फिर पाँच साल में आ जाएगे आपके पास वोट लेने आप को जाति धर्म और कुछ नही तो देश आर्मी के नाम पर बहला ही लेगे और हम भोले भाले लोग फिर से बहल ही जाएगे
          बहुत ही जरुरी है कि हम अपनी जरूरत को पहचाने की हमे क्या चाहिए हम क्यो किसी नेता के झण्डे उठाएगे हम क्यो नही पूछते की नेता जी आपने जो पिछली बार कहा था उसका क्या हुआ आप अबकी बार क्यो नए बादे लाए है पिछले का नतीजा क्या हुआ उसका हिसाब दे दिजिए फिर हम अगले के बारे मे बाद करेगें
          जरूरी है कि किसी एक पार्टी या विचार के नेता का गोल मटोल जाबाब नही है मुद्दे पर तो जरूरत है कि आप और हम हर किसी से सवाल जरूर करे अगर सवाल करने का मौका न मिले तो किसी न किसी रूप मे वहिष्कार ही करे अगर आने वाली पीढ़यो को अच्छा सुनहरा भविष्य देना है तो जरूरी है कि आप जागरूक हो नही तो आज दिल्ली के लोग गैस चैम्बर में जी रहे है तो कल को कानपुर के परसो को लखनऊ के नम्बर हर किसी का आएगा लोग आज दिल्ली पर बयानबाजी कर रहे है कि दिल्ली ऐसी है वैसी है लेकिन अगर  आप ध्यान दे तो क्या पाते है कि थोड़ा बहुत हर शहर यहां तक की गाँव भी प्रदूषण की चपेट में है वही अपने देश के मुख्य चुनाव का मुद्दा ही नही है अभी प्रदूषण जब तक यह मुद्दा बनेगा तब तक काफी जनता और शहर को यह निगल लेगा अपने देश की एक समस्या यह भी है कि हम लोग बहुत ही भोले लोग जो देर से जगते है तब तक जिम्मेदार लोग निकल चुके होते है और एक नया लूटने और टोली पहनाने के लिए तैयार है तो सम्भलना हमे है क्योकि रहना हमें है आज या कल के नेता मंत्री का क्या है वे तो इतने समृद्ध हो गए है कि यहा न रहने लायक बचा तो कोई और जगह ढूढ लेगें सोचो हम और आपको तो यही रहना है?

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