चुनाव और भारतीय किसान


हमारे देश मे वर्तमान समय मे अगर कुछ जोर शोर से चल रहा है तो वो चुनाव ही है ,बाकी चीजे तो अभी कुछ दिनों के लिए एक तरफ हो गयी है । बस हर पार्टी हर किसी को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए वादों की पोटली फेंक रहा है
इन्ही वादों की पोटली का पिछले कई सालों से या यूं कहे कि जब से चुनाव हो रहे है तब से किसान भी एक मुद्दे की तरह ही रहा है। जिसका सभी ने इस्तेमाल ही किया है वो न तो तब खुशहाल हुआ न ही अब है ।यह एक ऐसा प्राणी है जिसका चुनाव के तुरंत पहले सबको याद आती है लेकिन जैसे ही चुनाव बीतता है फिर इनका हाल वही हो जाता है कि 'आप कौन'
भारत की बहुत बड़ी आबादी किसान है अगर नही भी है तो एक बड़ी जनसंख्या उससे किसी न किसी रूप में जुड़ी है।फिर भी किसान इतना दीन हीन क्यो है,क्यो इनको केवल वोट के लिए ही याद किया जाता है,क्यो ये नेता उनके वोट लेकर उन्ही को दरकिनार कर देते है। क्यो किसान के दर्द को कोई सरकार न आज तक सुन पाई और न ही उनके दर्द को खत्म करने का कोई उपाय किसी सरकार ने नही किया
इसका एक कारण जो मुझे लगता है वो यह है कि किसान संगठित नही है वह जाति ,मजहब,समुदाय और धर्म जैसी चीजों में फंस कर रह गया है और इसी का फायदा राजनीतिक पार्टियां उठाती है। उनको पता है कि चुनाव के पहले एक भाषण देते ही सब किसान अपने वास्तविक मुद्दे भूल जाएंगे और वोट तो दे ही देंगे। तभी तो इतने ज्यादा किसान आत्महत्या किये लेकिन सरकारे मौन रही अगर उन्हें लगता कि यह बड़ी समस्या है तो संसद तब तक शांत न होती जब तक किसान की आय दुगुनी होने का सचमुच कोई रास्ता निकाल न लिया जाता लेकिन हकीकत आपके सामने है आय दुगुनी होना तो केवल भाषणों तक ही रह गया ऊपर से किसानों को दुश्वारियां पहले से बढ़ ही गयी है
अतः आप सभी किसान अलग अलग नही संगठित आवाज बनिये तो नेता झक मार के आपके पास आएगा क्योकि बनाते हम है उन्हें तो सुनना भी पड़ेगा उनको लेकिन वो तभी सुनेगे जब उन्हें लगेगा किसान चुनाव को प्रभावित ही नही बदल ही देंगे
।।जय जवान,जय किसान।।

Comments

Popular posts from this blog

दौर-ए-चुनाव ।आरोप प्रत्यारोप की महफ़िल

लीक सिस्टम में कराहता प्रतियोगी

आप भारतीय नागरिक पहले है,वोटर बाद में