चुनावी साल: नए मुद्दे क्यो नही

यह साल चुनावी है ,पूरा का पूरा परिवेश चुनावी हो गया है,मैं भी चुनावी, तू भी चुनावी,और ये सारा देश ही चुनावी,चुनाव से बड़ी आशा थी कि अबकी बार लोगो के और देश के मुद्दे कुछ अलग होंगे लेकिन अबकी बार भी देश को निराश ही हाथ लगी
देश के मुद्दे जो कुछ दिन पहले तक सर उठा भी रहे थे कही न कही दब से गये ,देश को कही न कही से फिर उन्ही पुराने मुद्दों के तरफ मोड़ दिया गया जबकि कायदे से देखे तो बेरोजगारी देश के लिए बड़ा मुद्दा हो सकता था लेकिन जो बेरोजगार है वही बेरोजगारी को चौकीदारी जैसे बेतुकी बातो के चक्कर मे भूलकर चौकीदार बने फिर रहे है। दूसरा जो विपक्ष है वो चोर साबित करने में भिड़ा पड़ा है
आपके लिए कितने यूनिवर्सिटी ,कॉलेज ,स्कूल और रिसर्च सेंटर खोले गए यह सवाल नही हो रहे है सवाल यह हो रहा है कि चुनाव में हिंदू जीत रहा है या मुसलमान
आपके लिए कितने एम्स या अन्य हॉस्पिटल बने ,कितने कैंसर सेंटर बने यह हमारा मुद्दा नही है हमारा मुद्दा है कि देश मे वोट का बंदरबाट कैसे हो
प्रदूषण बड़ी समस्या बन रही है वो पर्यावरण ,जल,थल जिसका भी हो हम यह सवाल नही पूछ रहे है कि इनके लिए क्या हुआ और क्या होगा
अगर हम अपने दिमाग से न चलकर नेताओ के दिमाग से चलेंगे तो स्वास्थ्य ,शिक्षा,स्कूल,कॉलेज,और पर्यावरण हमारी प्राथमिकता बनेंगी ही नही,क्योकि वो चाहते ही नही की यह सवाल बने ,वो तो देश को भेड़ चाल में चलाकर खुद के ही परिवार को आगे बढाने में लगे है,तो सोचिये करना क्या है
और हमे भी बताइये।।

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